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मक्का-फीड / औद्योगिक श्रेणी
 
सामान्य विशेषताएं
  • मक्का (मकाई) अमेरिकी मूल का है और गेहूं और चावल के बाद यह विश्व में सबसे महत्वपूर्ण अनाज है।
  • यह मानव (33.3%) और जानवरों (66.6%) दोनों को पोषण प्रदान करता है।
  • यह स्टार्च, तेल और प्रोटीन, मादक पेय, फूड स्वीटनर्स और हाल ही में ईंधन के उत्पादन के लिए बुनियादी कच्चे माल के रूप में कार्य करता है।
  • मुख्य रूप से खाद्य के लिए पैदा की जाने वाली विशेष फसलों में स्वीटकॉर्न और पॉपकॉर्न शामिल हैं, हालांकि पिचका, माडी़दार या फूले हुए आटे और चकमक पत्थर जैसा फ्लिंट मक्का भी व्यापक रूप से भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। फ्लिंट मक्का चारे के रूप में भी उपयोग किया जाता है। या तो उबला हुआ या भुना हुआ अपरिपक्व साधारण भुट्टा व्यापक रूप से सेवन किया जाता है।
 
वैश्विक परिदृश्य
  • वर्ष 2003 में वैश्विक मक्का उत्पादन 614.3 मिलियन टन था जबकि वर्ष 2004 में कुल 642.6 मिलियन टन वैश्विक मक्का उत्पादन होने की आशा है।
  • अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ के 25, ब्राजील, मेक्सिको, अर्जेन्टीना और भारत प्रमुख उत्पादक देश हैं। कुल वैश्विक मक्का उत्पादन का लगभग 80% इन देशों से प्राप्त होता है।
  • मक्का की खपत वाले प्रमुख राष्ट्र चीन और अमेरिका हैं।
  • मुख्य रूप से मांस और स्टार्च क्षेत्र से मांग में वृद्धि के कारण मक्के की खपत की मांग में लगातार वृद्धि हुई है। मुर्गीपालन (कुक्कुट) क्षेत्र में मक्के की आवश्यकता में निरंतर बढ़ रही है, जहां मक्के को चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • जापान, कोरिया, ताइवान, मेक्सिको, इजिप्ट, मलेशिया, यूरोपीय संघ (ईयू) और कोलंबिया मक्के के प्रमुख आयातक देश हैं।
  • मक्के के प्रमुख निर्यातक देशों में अमेरिका पहले नंबर पर है, बाद में अर्जेन्टीना और ब्राजील का नंबर आता है। छोटे निर्यातक देशों में चीन, दक्षिण अफ्रीका, यूक्रेन का नाम आता है, उनकी हिस्सेदारी बहुत ही कम है। केवल अमेरिका ही एक निर्यातक के रूप में मक्के के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर हावी है।
 
भारतीय परिदृश्य
  • खरीफ के मौसम में 80-90 प्रतिशत उत्पादन के साथ भारत का मक्का उत्पादन 10-14 मिलियन टन के बीच घटता-बढ़ता रहता है।
  • मक्का उत्पादन में योगदान देने वाले मुख्य राज्यों में कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश हैं।
  • 6.5 मिलियन टन (मोटे तौर पर कुल खपत का 50 %) मुख्य रूप से मुर्गीपालन (कुक्कुट) चारा उपयोग के लिए जाता है। अन्य 1 मिलियन टन मक्का स्टार्च उद्योग द्वारा प्रयोग किया जाता है।
  • भारत पारंपरिक रूप से एक मक्का आयातक देश है और सरकार एक निश्चित मात्रा ( प्रति वर्ष निर्धारित की जाती है) 15 प्रतिशत पर आयात करने की अनुमति प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त 50 प्रतिशत पर आयात करना पड़ता है।
  • हालांकि वर्ष 2003-04 में भारत ने मुख्य रूप से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों को लगभग 3-5 लाख टन मक्के का निर्यात किया था।
  • घरेलू आय में वृद्धि ने मानव खपत को मक्के से चावल और गेहूं जैसे अन्य अनाजों पर स्थानांतरित कर दिया है। आय में वृद्धि मांस की खपत, विशेष रूप से मुर्गी की में भी बढ़ती खपत का कारण बना है और जिससे मक्के की चारे के रूप में मांग में काफी वृद्धि हुई है।
 
चावल/गेहूं/मक्का कीमतों को प्रभावित करने वाले कारक
  • फसल के उत्पादन में मौसम की भूमिका बहुत बडी़ है। तापमान, वर्षा और मिट्टी में नमी काफी महत्वपूर्ण मानदंड हैं जो फसल की स्थिति निर्धारित करते हैं। अलावा इसके तूफान, बाढ़, सूखा और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं भी हैं जो फसलों को प्रभावित कर सकती हैं। बाजार इन घटनाक्रमों पर भी नजर बनाए रखता है।
  • सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भी कमोडिटी की कीमतों पर भारी प्रभाव पड़ता है।
  • सस्ती दरों पर वैकल्पिक उत्पादों की उपलब्धता मांग में कमजोरी ला सकती हैं। यह स्थिति विशेष रूप से तब पैदा होती है जब प्रमुख उत्पादों की कीमतों की प्रवृत्ति ऊंची रहती हैं। उदाहरण के लिए मक्के के बदले ज्वार/बाजरा मुर्गी (कुक्कुट) चारा उत्पादकों का पसंदीदा बन सकता है यदि मक्के की कीमतें ऊंची होंगी।
  • कृषि फसलों में मौसमी चक्र मौजूद हैं, विशेष रूप से लघु अवधि वाली वार्षिक फसलों में। जैसे-जैसे फसल कटाई में प्रगति होती है और उत्पाद बाजार में आना शुरू हो जाता है, कीमतें कम होने लगती हैं। बुआई के वक्त और फसल कटाई के पहले तंग आपूर्ति की स्थिति में कीमत में अक्सर बढो़तरी होती है।
  • प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सफलता उत्पादकता में बढो़तरी कर सकती है और आपूर्ति को अधिक बढा़ देगी। यह कीमतों में थोडी़ नरमी ला सकती है।
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महत्वपूर्ण डाउनलोड्स
 
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वेब संसाधन
 www.agricoop.nic.in
 www.agmarknet.nic.in
 www.imd.ernet.in
 www.agriwatch.com
 www.commodityindia.com
 www.clfmaofindia.org
 www.fas.usda.gov
 www.fao.org
 www.futuresource.com
 
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