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आलू (आगरा)
 
सामान्य लक्षण
गेहूं, चावल और मक्के के बाद आलू विश्व की चौथा महत्वपूर्ण खाद्य फसल है। इसके व्यापक संभावित पैदावार और उच्च पौष्टिकता के चलते केद और मूल के फसलों के प्रारूप में सालाना विश्व के लगभग आधे से अधिक भागों में इसका उत्पादन होता है। इस प्रकार, तकरीबन सालाना 3000 लाख टन वैश्विक उत्पादन के साथ आलू विकसित और विकासशील दोनों देशों में आर्थिक दृष्टिकोण से मुख्य फसल है।
 
आपूर्ति - मांग परिदृश्य
  • चीन, रूस, पोलैंड और यूक्रेन के बाद भारत आलू उत्पादन में पांचवें स्थान पर है। फिर भी भारत में आलू का उत्पादन केवल 16-19 टन प्रति हेक्टेयर होता है जबकि इसके मुकाबले यूरोपीय देशों और अमेरिका में यह आंकड़ा 30-40 टन प्रति हेक्टेयर है।
  • भारत में आलू की खेती विविध उच्च कृषि उपयुक्त मौसम की स्थितियों में की जाती है। प्रतिवर्ष तीन बार फसल की खेती होती है।
    ग्रीष्म फसलः मार्च अप्रैल.......................अगस्त – सितंबर
    पतझड़ फसलः अगस्त – सितंबर...............दिसंबर- जनवरी
    वसंत ऋतु फसलः जनवरी- फरवरी.................मई-जून
  • आलू मुख्यतः रबी की फसल है और जिसकी खेती मुख्यतः उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात में की जाती है।
  • 2004-05 के दौरान देश में 241.50 लाख टन आलू का उत्पादन हुआ था जबकि 2003-04 में उत्पादन आंकड़ा 232.70 लाख टन था।
  • आलू की औसतन उपज के लिए 12 से 15 लाख हेक्टेयर के बीच जरूरत होती है, जो बुआई के दौरान के मौसम की स्थिति पर भी निर्भर करता है।
 
मासिक मूल्यों के उतार-चढ़ाव
आलू कीमतों में मासिक बदलाव (जनवरी 2000-जून 2004)
अस्थिरता < 5
5 - 10 10 - 15 > 15
कितनी बार 12.96 14.81 18.52 55.70
 
प्रमुख व्यापारिक केंद्र
उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल भारत के चार आलू निर्यात क्षेत्र हैं। आगरा, हाथरस, कानपुर, मेरठ, फर्रखाबाद-उत्तर प्रदेश के प्रमुख आलू बाजार हैं ; पंजाब में जालंधर, लुधियाना, फुल और पटियाला; मध्य प्रदेश में उज्जैन, इंदौर और देवास और पश्चिम बंगाल में हुगली, बर्दवान और हावड़ा प्रमुख आलू के बाजार हैं।
 
बाजार पर असर करनेवाले घटक
  • आलू की घरेलू उपज में बदलाव पैदावार और इससे प्राप्य आय पर आधारित है।
  • फसल प्रक्रिया के दौरान विशेषतः ठंडी हवाओं और भारी वर्षा के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में फसल का विकास मौसम प्रक्रियाओं पर निर्भर होता है।
  • घरेलू बाजार में अन्य सब्जियों की तुलना में समान कीमत।
  • प्रमुख शहरों और खाद्य- प्रसंस्करण औद्योगिक इकाइयों द्वारा आलू की शीघ्र मांग।
  • बुआई के दौरान आलू की कीमतें बाजार के अनुकूल होती है और कटाई के दौरान इसमें गिरावट आ जाती है।
  • यातायात परिवहन शुल्क भी कीमतों पर गहरा असर डालते हैं।
  • अच्छी कीमत मिलने की आस में बिक्री के पूर्व आलू उत्पादक और व्यापारी फसल को जमा कर रखते हैं। आलू को शीतग्रहों में बिना खराब हुए 5-6 महीनों तक रखा जा सकता है।
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