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बिजली
 
सामान्य विशेषताएं
  • आर्थिक दृष्टि में बिजली (दोनों पॉवर और एनर्जी) खरीदी, बेची और व्यापार की जा सकने वाली एक कमोडिटी है। पॉवर किसी भी समय में एक जनरेटर का मीटर के माध्यम से कुल विद्युत उत्पादन होता है और उसे मेगावाट (एमडबल्यु) में मापा जाता है। ऊर्जा (एनर्जी) बिजली है जो एक मीटर प्वाइंट के जरिए प्रवाहित होती है और उसे मेगावाट ऑवर्स (एमडबल्युएच) में मापा जाता है।
  • बिजली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसे आसानी से संग्रहित नहीं किया जा सकता है और यह प्रकाश की गति से प्रवाहित होती है। इस प्रकार इसे उसी समय उत्पादित किया जाना चाहिए जब इसका उपभोग होता है और अन्य कमोडिटीज के विपरीत सामान्य ऑपरेटिंग स्थिति में इसका भंडारण करना, रैशनिंग या इसके लिए ग्राहकों की कतारें संभव नही है। इसके अतिरिक्त मांग और आपूर्ति लगातार बदलती रह्ती है।
  • बिजली की गैर-भंडारिता बिजली बाजार को अन्य वित्तीय बाजारों तथा दूसरे जिंस बाजारों से भिन्न बनाता है। बिजली उत्पादन में कमी या बिजली की अधिकतम मांग का परिणाम हाजिर बिजली कीमतों में असमानांतर छलांग, तेजी व अस्थिरता के रूप में नजर आता है। पॉवर स्टेशनों पर अतिरिक्त उत्पादन क्षमता और ईंधन का भंडार बनाए रखना ही मांग को पूरा करने का बस एक रास्ता है।
  • बिजली में थोक सौदे (बिड्स एवं ऑफर्स) विशिष्ट रूप से बाजार ऑपरेटर द्वारा निर्धारित और निपटाए जाते हैं या एक विशेष-उद्देशीय स्वतंत्र इकाई को उस कार्य के लिए विशेष रूप से प्रभार दिया जाता है।
 
भारतीय बिजली क्षेत्र की मूल बातें
  • नेशनल थर्मल पॉवर कॉर्पोरेशन और नेशनल हायड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कॉर्पोरेशन जैसे प्रमुख राष्ट्र स्तर की कंपनियों के साथ भारतीय बिजली क्षेत्र प्रमुख रूप से भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा नियंत्रित होता है। यह क्षेत्र वर्ष 1991 में निजी क्षेत्रों के लिए खोला गया था और वर्ष 2017 तक इसके भारत की संस्थापित क्षमता की 30% की हिस्सेदारी हो जाने की आशा है।
  • बिजली के अंतर्राज्यीय प्रसार और राष्ट्रीय ग्रिड के विकास के लिए दि पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया उत्तरदायी है। ट्रांसमिशन सिस्टम के लिए पूरे देश को पांच क्षेत्रों उत्तरी क्षेत्र, उत्तर पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी क्षेत्र, दक्षिणी क्षेत्र और पश्चिमी क्षेत्र में नामानुसार विभाजित किया गया है। प्रत्येक क्षेत्र के अंतर्गत दि इंटरकनेक्टेड ट्रांसमिशन सिस्टम को क्षेत्रीय ग्रिड भी कहा जाता है।
  • बिजली अधिनियम 2003 ट्रेडिंग को एक स्वतंत्र गतिविधि की मान्यता देता है और तदनुसार अंतर्राज्यीय ट्रेडिंग के लिए सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी कमीशन (सीईआरसी) द्वारा ट्रेडिंग लाइसेंस जारी करने का प्रावधान प्रदान करता है।
  • भारत में उपभोग की जाने वाली बिजली का लगभग 66 प्रतिशत थर्मल पॉवर प्लांट्स द्वारा, 25 प्रतिशत हायड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट्स द्वारा और 3 प्रतिशत न्युक्लियर पॉवर प्लांट्स द्वारा उत्पादित की जाती है। 50 प्रतिशत से अधिक भारत की वाणिज्यिक ऊर्जा मांग देश के विशाल कोयला भंडार से पूरी की जाती है।
  • वर्तमान में भारत एक प्रमुख स्तर पर महत्वपूर्ण रूप से अपनी संस्थापित क्षमता को बढा़ने के लिए पवन ऊर्जा (विंड एनर्जी), परमाणु शक्ति (न्युक्लियर पॉवर) और सौर ऊर्जा (सोलार पॉवर) जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।
  • भारत में थोक संचरण (बल्क ट्रांसमिशन) वर्ष 1950 में 3,708 सीकेएम (सर्किट किलोमीटर) से बढ़कर वर्ष 2009 में लगभग 6.6 मिलियन सीकेएम पहुंच गया है तथा कुल ट्रांसमिशन लेंथ व डिस्ट्रिब्यूशन लाइन्स के संदर्भ में भारत विश्व में तीसरा सबसे बडा़ देश है।
  • ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन के दौरान भारत में बिजली की क्षति अत्यंत ऊंची है और सिर्फ 10% के वैश्विक औसत के मुकाबले लगभग 30% है।
 
भारतीय आपूर्ति एवं मांग परिदृश्य
  • 3.4 प्रतिशत वैश्विक ऊर्जा खपत की हिस्सेदारी के साथ भारत विश्व का छठा सबसे बडा़ ऊर्जा उत्पादक एवं ग्राहक देश है। भारत की आर्थिक उन्नति के चलते पिछले 30 वर्षों में भारत में ऊर्जा मांग औसतन 3.6 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढी़ है।
  • मार्च 2009 में भारत की संस्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 1,47000 मेगावाट रही जबकि प्रति व्यक्ति बिजली खपत 612 किलोवाट (केडबल्युएच) पर रही।
  • देश का वार्षिक बिजली उत्पादन वर्ष 1986 के लगभग 190 बिलियन किलोवाट (केडबल्युएच) से बढ़कर वर्ष 2009 में 720 बिलियन किलोवाट (केडबल्युएच) हो गया।
  • इस क्षेत्र में विकास के बावजूद मांग अभी भी आपूर्ति के आगे बढी़ हुई है। जबकि औसत बिजली कमी लगभग 8-9 प्रतिशत है, और अधिकतम कमी 12-15 प्रतिशत के करीब है। बिजली की कमी के कारण पूरे भारत में बिजली की कटौती आम है और इसने देश के आर्थिक विकास पर काफी प्रतिकूल प्रभाव डाला है.
  • भारत सरकार ने वर्ष 2012 तक सभी के लिए बिजली सुनिश्चित करने के मिशन के साथ वर्ष 2012 तक लगभग 78,000 मेगावाट की संस्थापित उत्पादन क्षमता और जोड़ने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस बीच वर्ष 2030 तक भारत की कुल बिजली मांग के 9,50,000 मेगावाट के भी पार चले जाने की आशा है।
  • एक महत्वाकांक्षी ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम के बावजूद ब्लैक आउट के दौरान लगभग 400 मिलियन भारतीयों को बिजली नहीं मिली। जबकि लगभग 83 प्रतिशत भारतीय गांवों में बिजली की लाइन होने पर भी वर्ष 2009 में सिर्फ 47 प्रतिशत ग्रामीण घरों में ही बिजली का कनेक्शन है।
 
बाजार को प्रभावित करने वाले कारक
  • किसी अन्य कमोडिटी की तरह ही वह मूल्य जिस पर वर्तमान आपूर्ति-मांग परिदृश्य के द्वारा बिजली निर्धारित की जाती है और सहभागियों की उदीयमान बाजार की बुनियादी बातों की धारणा। हालांकि आंतरिक रूप से इस कमोडिटी की विभिन्न प्रकृति आपूर्तिकर्ताओं/खरीदारों को भविष्य में मांग की प्रत्याशा में बिजली संग्रहण से रोकती है।
  • जैसा कि एक नए बिजलीघर की स्थापना बहुत पूंजी-प्रधान है, बिजलीघरों के द्वारा मौसमी, प्रत्याशित/अप्रत्याशित अधिकतम मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त क्षमता या अतिरिक्त स्टॉक बनाए रखा जाता है।
  • भारत में बिजली उत्पादन में कोयला और पानी की उपलब्धता बिजली उत्पादन को सीमित करने के प्रमुख कारक हैं। सर्वाधिक बिजली उत्पादन कंपनियों का ईंधन ही सबसे महत्वपूर्ण लागत कारक है जो कि परिचालन खर्चों के साथ-साथ उत्पादन लागत के 50 प्रतिशत से भी अधिक के लिए जिम्मेदार है।
  • भारत में तापीय बिजली (थर्मल पॉवर) उत्पादन के लिए कोयले की कमी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। देश के विशाल कोयला भंडार के बावजूद हाल के वर्षों में आयात में बढो़त्तरी हुई है और बिजली उपयोगिताओं के वर्ष 2008-09 में लगभग 18 मिलियन टन के आयात की सूचना है तथा वर्ष 2009-10 के लिए तेजी से बढ़कर 35 मिलियन टन का लक्ष्य है।
  • बिजली के लिए भी मानसून एक महत्वपूर्ण मूल्य निर्धारण कारक है। सही समय पर सब स्थानों पर पर्याप्त वर्षा कृषि के लिए पानी की उपलब्धता बढा़ देती है और बिजली की खपत को कम करती है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि बिजली उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता देश के विभिन्न बांधों और जलग्रहण क्षेत्रों पर निर्भर है।
  • समग्र आर्थिक परिदृश्य उद्योग के द्वारा बिजली के उपयोग को निर्धारित करता है और कीमतों को प्रभावित करता है।
  • तापमान, मानसून, जैसे मौसमी कारक खुदरा ग्राहकों की बिजली खपत निर्धारित करते हैं और कीमतों पर एक अत्यंत गहन प्रभाव डालते हैं।
  • अन्य वैश्विक बाजारों में बिजली की कीमत का भारतीय कीमतों पर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं होता है। हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से क्रूड तेल, कोयले की वैश्विक कीमतें घरेलू बिजली संयंत्रों की कच्चे माल की लागत पर प्रभाव डालते हैं और लंबी अवधि में स्थानीय घरेलू बिजली कीमतों को प्रभावित करते हैं।
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